Wednesday, May 2, 2007

भाग - सत्ताइस



सुरुज देउता ह किसिम किसिम के रंग ल एती ओती छरिया के बड़ हरबर हा असन अपन लोक कोती जावत रहय। अइसे लागय के उहू ल अपन गिरस्ती के सुरता ह आगे हावय। मंगलू ह बड़ गुनिस फेर मन ल पोठ कर लिस के खेती करहूं अउ अपन गिरस्ती ल बने ढंग ले चलाहूं। संझा के होत-होत ओह सोहागी के मनखे बइसाखू के घर कोती रेंग दिस।

कसगा भइया बइसाखू, हावस गा ?

ह हो बइठगा, चोंगी-माखुर लेके आवत हावंव।

तहीं सिपचा ले भइया में त नइ पियवंव बीड़ी माखुर।

कइसे गा भइया मोर घरेतिन ह काहत रिहिस के अब तहूं खेती करबे।

त का करवंगा। पढ़ई-लिखई ह त काम नइ दिस। गिरस्ती के बोझा ल बिन बूता के त उचाय नइ सकवं। फेर खेती ह उबार लेतिस तहूं बने होतिस।

बने गुने हावस गा।अउ फेर अब केसान मन के दिन ह घला बने आवत हे। हमर जवाहिर लाल ह कहे हे, देश के पोसइया केसान आंय। उन्खर जम्मो किसम के मदत करे जावय। तेखरे ले हमर गांव मां घला विकास जोजना के दबदर ह खुलत हे।

ये दबदर मां का होही जी ?

इहां सब केसान मन के सुख दुख के पुछइया अउ मदत करे बर एक बड़का साहेब रइही। ओखर संगी अउ कतको झिन लिखई-पढ़ई करहीं। ये मन कोन टेम के बोवइ मां खातू डारना चाही, कोन किसम ले हल बख्खर चलाना चाही। जम्मो बात ल समझाहीं। तैं त केसानी काम अबले नइ करे। तोर ददा ह होतिस त आज के खेती मां अन्न उपजा के फेर ले गौंटिया बनतिस। किसम किसम के खातू, किसम किसम के हल बख्खर।

त मोला काय करे बर परही जी ? तैं त जम्मो केसानी के रद्दा ल अभिन्चे बता डारबे तइसने लागथे।
अभी नइत पाछू त मोला बतायच बर परही गा। नइ त तोर बहिनी ह मोर जी ल खा डारही। काली तैं मोर संग रइपुर चलबे उहां रइपुर कोपरेटिव बैंक हे। उहां के साहेब सकसेना ले तोला भेंट करा दूहूं। ओह खेत उप्पर रुपिया देवा दिही। फेर सुरता राखबे खेत के लिखा-पढ़ी के कागद ल घला राख लेथें उही ल देखके रुपिया लागा मां मिलथे।

मोर त लागा के नामेंच सुने ले टोटा ह सुखा जाथे गा। इही लागाह त हमर सतियानाश कर देहे।

तैं काबर डर्रात हस जी। ये लागा ह रामधन के बबा के लागा नोहे। पांच सौ के बियाज हजार रुपिया।
ये सरकारी लागा आय। नाम के बियाज लेथें।

देख गा भइया, बने रद्दा बताबेगा। मोर दुख दुख मं चेत ह नसागे हें।

तैं फिकर झिन कर गा, काली रइपुर चलबे सबे बन जाही।

बिहिनिया ले बइसाखू ह मंगलू के घर मां पहुंचगे। मंगलू घला तियार होके बइसाखू के रद्दा देखत बइठे रहय। बइसाखू अउ मंगलू रइपुर बर रेंग दिन। ये मन रइपुर के कोपरेटिव बेंक मां गिन। फेर ग्यारा के बजत ले साहेब मन आइन त बइसाखू अउ मंगलू सकसेना साहेब के दबदर मां नीगिन।

आव जी मंडल, आवव। कोन गांव ले आवत हवव जी ?

हमन रइपुरा ले आवत हन साहेब। हमर गांव के ये जुन्ना गौंटिया आय। दिन ह गिरगे हे एखर। एला तुम्हर बैंक ले लागा मां रुपिया चाही।

एखर खेती उती हे गा ?

में कहें त साहेब, के ये जुन्ना गोंटिया आय। जमीन-जांता हवय गा।

त बने हे, कतका खेत हावय ?

दू एकर हे गा।

त एला एक हजार लागा मां मिल सकथे। लिखा-पढ़ी आज करा लौ अऊ काली बड़का साहेब के दसखत होय उप्पर रुपिया मिल जाही। अउ ओतके बेर तुमला रुपिया कब अउ कइसे पटाना परही जम्मों बात समझा दे जाही।

बने हे साहेब, भगवान ह तुम्हर जस अउ बढ़ती करै।

ठीक हे तुमन ए चपरासी संग जावव ये ह तुम्हला बाबू मेंर पहुंचा दिही।

दू घंटा लगगे लिखइ-पढ़इ मां। बाबू ल राम राम कइके ये मन फेर रइपुरा बर रेंगिन। दूसर दिन उनला एक हजार रुपिया मिलगे।

मंगलू ल एक हजार रुपिया त मिलगे। फेर ओह खेती के बूता ल कइसे करे समझे नइ पावत रहय। बइसाखू मेंर जाके पूछवं कहिके ओह ओखर घर गिस।

कइसेगा भइया रुपिया त मिलगे, अब कइसे करे के सोचे हवस।

में त खेती कइसे करंव आज ले नइ जानवं। ददा ह त साहेब बनाय बर उतिया गे रहय। ओखर ले खेती के कुछु बूता ल नइ जानवं।

तैं झिन फिकर करगा। में तोर संग देहूं।

तोरे आसरा हे गा।

ले जा गा, फिकर बिलकुल झिन कर। भगवान ह सब बने करही।
क्रमशः

भाग - अट्ठाइस



गांव वाला मन ल घला आरो मिलगे रहय के मंगलू ल एक हजार रुपिया मिलगे हे। उन्खर मनके आंखी ह फुटाय असन होगे। ओमन घला रुपिया बेंक ले लागा मां ले रहंय। फेर मंगलू ल रुपिया मिलइ ह उनला अखरगे जइसे उन्कर ददा के रुपिया ल मंगलू ह झींक लाने हे।

गांव वाला मन के हांका परइ ह मोंगरा घला सुन डारिस। ओह फिरन्ता के दुख ल बिसरा के मंगलू के घर चल दिस। रद्दा मां देवी के मंदिर मां हाथ ल जोर के मूंड़ी नवाइस। बड़ सत के हावस हो देवी, मोर भइया के दुख ह तिरिया दे वो। तोला जम्मों झिन के फिकर लगे रइथे। तोरेच नोनी बाबू त आन। कतेक दुख ल देबे ओ। इही मने मन गुनत ओह मंगलू के दुआरी मां आगे। देखिस त दुआरी मां दू जोड़ी बने बइला बंधाय रहंय। ओखर जी ह जुड़ागे। वो उहिंचे ठाढ़ होगे। भितरी ले केतकी ह सानी के टोकना ल मूंड़ी मां धरे आवत रहाय। मोंगरा ल देखिस त सानी के टुकना ल भुइंया मां मढ़ा दिस अउ मोंगरा ल अपन कोउरा मां भर लिस।

अइ कइसे करत हावस ओ भउजी, भइया ले भेंट नइ होवत हे का।

हहो ओ नोनी, एखरे ले त तोला पोटार के अपन साध ल बुझावत हवंव। तैं त ओला केसानी काम मां लगा देय।

ले का होगे ओ भइया नइ देखे फेर में त नइ छोड़ंव तोला। मोर ले साध बुताथे त बुताले।

ले टार ओ तोर आनी बानी के गोठ ल, चल भितरी। मेंह बइला मन ल सानी देके आवत हवंव।
हहो।

मोंगरा ह भितरी मां जाके पीढ़ा उप्पर बइठगे। केतकी ह बइला मन ला सानी देके आइस त किहिस – नोनी तोर बात ल मान के हमर मन के दिन ह फिरही ओ तइसने लागथे। तैं हमर मन बर देउता होगे ओ, तोर मुख ले भगवान ह भाखा बोलिस।

ले चुप्पे रह ओ भउजी, तोर आनी बानी के गोठ ह मोर समझ मां नइ आवय। मनखे के करे कुछु नइ होवय ओ भउजी। जभ्भे भगवान ह चेत करथे तभे दुख ह सिराथे। भइया ह अतेक जल्दी केसानी करे बर मान जाही तेला में नइ जानत रहवं। फेर तोर मोहनी ले नइ बांचिस बेचारा ह तइसे लागथे।
ले फेर तोर आनी बानी के गोठ ह चले लागिस। तोर अब ले लइका मन असन गोठ चलथे।
काय करौं वो भउजी तोर मोहनी सूरत ल देखते मुख ले आनी बानी गोठ ह निकर जाथे।
ले टार ओ, तोर भइया ह खेत के मेंढ़ पार बनवाय बर खेत गे हे, बिहिनया ले। कुछु खाय पिए बर बना देंव। चल न रंधनी मां तहूं बइठबे।

ले चल काय होही।

रंधनी मां जाके केतकी ह बरा बनाय बर चूल्हा उप्पर कराही ल मढ़ाइस। बरा के छुनुन-मुनुन ह होवत रहय।

कस ओ नोनी, अब ले फिरन्ता के पता नइ चलिस। तोर भइया ह पता लगावत रइथे। कतको झिन ले कहि रखे हे। फेर अतेक दिन अकेल्ला रहि डारे अब तोर भइया कइथे के मोंगरा ल अब हमर मन संग आके रहिना चाही।

हहो भउजी आबे करहूं। तुम्हरे मन के त आसरा हावै मोला। तोर त घर ए ओ नोनी, तुम्हरे असीस ह त फलित होही ओ।

मोर काय ओ, भगवान ल जम्मों झिन के फिकर रइथे।

इन्खर गोठ ह नइ पुरे रहय अउ मंगलू ह आगे। मोंगरा ल देखत ओकर मुख मां हांसी खेलगे, तैं आय हावस ओ देवी दाई। तोर असीस ले मेंह पढ़ लिख के खेती करे ल धरलेंव।

तैं कभू कभू नानुक मन असन गोठ ल गोठिया डारथस भइया। पढ़े लिखे ह त आज काल खेती ल बने कर सकथे। आनी बानी के खाद निकलगे हावय अप्पढ़ ह त नइ समझे सकय। ओला त पुराना रद्दा रेंगे के टकर परगे हवय। नवा ल समझे में उनला डर लागथे। आज कहूं पढ़इया मन खेती करे ल धर लेवंय त हमर देश ले भुखमरी ह भगा जावय। आज पढ़ लिख के बाबू बने के कोसिस करथें, ए बने नो हे।
तैं त मोर दाई बनगे हावस ओ, तइसने लागथे।

नइगा भइया ये बात ह त मोर गजामूंग ह बने समझाथे। भांटो ह ओला जम्मो बात ल समझाथे अउ ओह मोला।

ह हो ओ डउकी मन के बुध ले चलही ये गांव ह।

ये त बात समझे के आय भइया, एमा डउकी-डउका के काय गोठ।

हहो ले चल बरा के महक आवत हे खाबोन।

ओतके बेर बाहिर ले धुर्रा में सनाय समारु अउ छोटका घला आगे। जम्मो झिन बइठ के बरा खाय लागिन। खाते खात मंगलू किहिस – मोंगरा तैं अब हमर मन संग आके रहिजा। खेती के काम ल धरे हन, तैं रहिबे त बूता ह कम होही अउ तोरो मन मं बोध लागही। मोंगरा हहो किहिस।

मोंगरा ह अब अपन भइया घर मां कोनों कोनहा मं अकेल्ला रोवय। कखरो अवई-जवई के आरो मिलते अंचरा ले आंखी ल झटकुन पोंछ डारय।

मंगलू ह खेती मां उत्ता धुर्रा भिड़गे राहय। ओह गुनय भगवान इही मां मोर बढ़ती ला कर देवय त मोर मन के साध ह पूर जाही। ओह बइसाखू ले पूछ-पूछ के खेती के काम ल मन लगा के करत रहय।
क्रमशः

भाग - उनतीस


बरखा ह आगे। दू पहटिया अउ एक पहटनिन मंगलू ह रख लिस। रइपुर के कोपरेटिव बैंक ले किसम किसम के खातू बिसा के लानिस। खेत मां बीज डारेगे। भगवान ह घला मंगलू के मदत करत रहय, तइसने लागथे। खेत बर ठउका पानी गिरिस।

बेरा के संगे संग धान ह लाम होवत जावय। मंगलू ह अपन खेती मं तनियाये धान ल देख फूल जावय। समारु ह मेंढ़ उप्पर फुदकत फुदकत चलय।

देवारी ह फेर आगे। मंगलू के खेत मां मूंड़ी ले उप्पर धान रहय। सघन खेती के अफसर ल एखर खबर देय गिस। बइसाखू ह मिलके साहेब ल जम्मो बात बताइस। साहेब ह मंगलू के खेत ल आके देखिस त बक्क खाय देखत रहिगे। मंगलू के फोटू उतारे गिस। अउ ओखर धान के घला। थोरके दिन मां रइपुर के अखबार मन मां मंगलू के फोटू छपिस के ये किसान पढ़े-लिखे हावय। उप्पर ले अपन किसानी ल नइ छोड़िस अउ रइपुरा गांव मां जम्मो किसान मन ले ज्यादा अनाज पइदा करिस। तउने ले ओला दस हजार रुपिया सरकार ह इनाम दिही।

अब का पूछना हे। मंगलू ह बाबू मंगल प्रसाद होगे। केतकी अउ मोंगरा के साध ह पूरा होगे।

ये जम्मो गोठ ह सब्बो झिन ल त बने लागिस। फेर गौंटिया रामधन के करेजा ह फाटगे। ओला मंगलू के बढ़ती ह फुटहा आंखी नइ सुहाइस। अपन संगवारी मन ल जोड़के ओह पंचाइती बुलाइस। अउ ओमा मंगलू ल जात ले निकारे के बात चलाइस।

पंचायती में मंगलू ल घला बोलाय गिस। पंच मन के आगू मां रामधन ह किहिस – के मंगलू ह नांगर चलाइस हे तउने ले ओला जात ले अलग करना चाही। बाम्हन घर जनम लेके नांगर चलाना ए ह बने नो हे।

पंचाइती मां बइसाखू घला आय रिहिस ओह किहिस – धीर धर गा गौंटिया, बेरा ह नजीक आगे हे। जोन खेत ल बोही ओखरे खेत होही। नइ त जम्मो सरकार के हो जाही। मंगलू ह अगुवागे त एमा कोताही के काय गोठ हे।

रामधन ह किहिस – त हमन ओला अभी जात मां नइ राखन।

मंगलू ह बड़ बेर ले एमन के गोठ ल सुनत रहय। ओह चिचिया के किहिस – कसगा रामधन, जात ले के घांव निकारबे जी। एक घांव त निकारे डारे हवव सब्बे जुर मिलके। में त जात मां मिलबे नइ करेंव।

मंगलू ह चल दिस। पंचाइती घला बिन कोनों फइसला के उठगे। रामधन के चाल ह नइ चलिस। वोहा गुने लगिस मंगलू के हिन्ता कइसे करवं।
क्रमशः

भाग- तीस


निंदाई के सुरुती अउ देवारी के सुरुती दोनों संगे संग आगे। मंगलू के देवारी ह अतेक बच्छर के दुख सहे के उप्पर फेर आगे। मंगलू ह रइपुर गिस। अउ जम्मो झिन बर लुगरा, पोलखा, सलूका अउ नेकर बिसा लानिस। देवारी ह त मंगलू घर आइस हे तइसने लागय। गांव भर ले मंगलू के घर बगबगाय। गांव भर मंगलू ले देवारी भेंटे ल आइन। फेर रामधन ह तनियागे। ओह नइच आइस।

जम्मो माई-पिला मन भिड़गे लुवाई मां। केतकी अउ मोंगरा घला मूंड़ी उप्पर धान के बीरा मन ला बोह बोह के बखरी मां लेज-लेज के राखंय। ले दे के जम्मो धान ह घर आगे। खरही गंजागे।

आज मंगलू ल समझ आगे के खेती सही मां अपने सेती बाढ़थे। धान ह घर आगे। ओखर दूसर दिन रइपुर ले एक ठिन कागज धर के एक मनखे ह आइस। ओमा लिखे राहय, के कल 6 बजे शाम को तुम्हारा सम्मान किया जाएगा तथा उसी समय तुम्हें श्रेष्ठ किसान की पदवी से भूषित किया जाएगा। इस प्रदेश की सरकार ने तुम्हें दस हजार रुपए पारितोषिक देने का निर्णय लिया है।

मंगलू ह लकर-धकर भितरी गिस। केतकी अउ मोंगरा ल बताईस के काली हमन रइपुर चलबोन। खेती ह हमर भाग ला जगा दिस। मोंगरा तैं मोर दाई हावस ओ। मोला बने रद्दा मं रेंगा देय। मोंगरा के जी ह घला हरियागे।

आज मंगलू ल नींद नइ आवत राहय। ओह मने मन गुनत रहय। कतेक तकलीफ सहेन फेर कहूं पहिली मोला चेत करातिन ये धरती माता के त, अब ले हमरो दिन ह बनउक हो जातिस। फेर ए जात सगा मन के आंखी ह उघर जातिस। उनला समझ मं आ जातिस के गरीबी के केतक बड़ दुख होथे।
मंगलू ह इही गुनत मांचा उप्पर एती-ओती ढुलगत रहय। छोटका ह उच्चके बइठगे। छोटका ल उच्चत देख के मंगलू ह केतकी ल हांक पारिस। केतकी ह घला उच्चगे। ओह देखिस के मंगलू ह अब ले नइ सूते हे।

कइसे नींद ह नइ परत हे का।

हहो ओ, नींद ह नइ जानंव कोन मेर चल दे हे। काली रइपुर जाय बर हवै न। तउने पाके नींद ह नइ आत हे।

ह हो गा, बड़ खुसी के बात आय। काली हमर मन के नवा जिनगी के सुरुती होही। मोंगरा के भाखा ह हमर मन बर भगवान के भाखा होगे।

सहिंच आय गा। फेर तोर मन ह त खेती करेके होते नइ रहाय। कतेक झगरा करे रेहे मोर ले।

ह हो, केतकी मोर मन ह त खेती में नइ लागतिस। तहीं बता न ओ, पढ़-लिख के खंती कोड़इ के काम। पढ़े लिखे मनखे ह कभू करे के नइ गुन सकय।

फेर तोर उही बुध ह चलत हे। पढ़ लिख के मनखे ह अउ हुशियार होथे गा। जतेक बने कमइ पढ़ लिख के मनखे ह कर लेथें ओतेक कोनों अपढ़ ह नइ कर सकय। मोंगरा घला कहत रिहिस के आज कहूं खेती में पढ़े गुने मनखे ह लग जावय त हमर गांव त गांव आय, सरी जग मं अन्न बगर जावै। जइसे अकास में जुघौनी। कोनों गुने नइ सकय के हमर देस मां कतेक अन्न उपजतिस। फेर घर घर मां सुखे सुख छा जाही।

तोरो गोठ ह अब मोर मन मां बस गे हे। महूं काली अपन भाखन मां कहूं के पढ़इया भाइ मन तुमन एती ओती नउकरी बर झिन किंदरो। गांव गांव मां जाके नवा नवा खेती के हुनर ल जम्मो झन ल बतावव।

ले चल बने हे। रात ह पहात जात हे। फेर नींद ह परही तेखर भरोसा नइये।

बिहिनिया सरी गांव मां एक नवा गोठ चलत रहय। कोनों मंगलू के बड़वारी करे त कोनों अभी ले हिन्ता करैं। मंगलू के दिन ह कभू फिरही तेखर चेत कोनों ल नइ रहय। जात सगा मन त अब मंगलू के बड़वारी करत रहंय के हमर सगा ह अतेक बड़ मान के हकदार बनिस। ओखर संगे संग हमरो मान ह बाढ़ही। फेर रामधन के करेजा उप्पर सांप लोटत रहय। ओह अप ननजतिया संगवारी मन संग बइठे मंगलूके दाइ ददा ल बखानत राहय।

देखे गा खेलावन, काली जोन गली मं भिखमंगा असन किंजरत रहय उही ह अब सरकार के मेरी बनगे। ओखर ले 10 बांटा जादा धान मोर घर आथे। फेर हमर सरकार के आंखी मां नइ दिखिस।

ह हो गा भइया रामधन तैं बने कइथस। फेर तोरे कहे ले काय होथे।

मोर जी त कलपगे गा। ओ दोखहा ल एनाम मिलही अउ में गांव के गौंटिया बइठे रहिगेंव। कोनों उपाय नइये गा के मंगलू ल सरकारी इनाम झिन मिलै।

तैं भकवागे हस गा। तोला एतका समझ नइये, के सरकार ह जम्मो पता लेके फेर कोनों इनाम ल देथे। मंगलू ह दू एकर मां जतेक धान उपजाये हे ओतेक तोर छै एकर मां नइ होवय। ये बने बात आय के मंगलू ह माइ-पिल्ला भिड़गे रहिन खेती ल सेय मां। भगवान ह उन्खर संग देइस। एमा कखरो जोर नइये।

त तहूं ओ दोखहा के बढ़वारी मोरे आघू करत हवस।

एमा बढ़वारी के कोन बात हे गा। जेखर बढ़वारी अब भगवान करत हावय, ओखर हिन्ता करे मां हमला अब काय मिलही।

त फेर तहूं रैंग दे मंगलू संग। तोला घला दू-चार फूल माला मिल जाही।

तैं झिन खिसिया जी। तोर खिसियाय उप्पर मंगलू के नइ बिगरे।
क्रमशः

भाग - एकत्तीस



मंगलू ल लेगे बर बिकास जोजना के मोटर-गाड़ी ह दुवारी मां आके लगगे। मंगलू अउ बइसाखू चउरा उप्पर बइठे एती-ओती के बात करत रहंय। मोटर गाड़ी के आते मंगलू ह केतकी ल हांक पारिस। मंगलू के हांक पारते केतकी, मोंगरा जम्मो माइ-पिल्ला दुआरी मां आगिन। मंगलू ह मोंगरा ले मोटर गाड़ी मं चघे बर किहिस। ओमन अघुवा के मोटर गाड़ी मां बइठगें।

जब मंगलू अउ बइसाखू घला मोटर गाड़ी मां चघे ल धरिन त जम्मों संगवारी मन संग रामधन ह ओती ले निकरिस। रामधन ल देखते मंगलू ह उहिन्चे ठाढ़ होगे अउ किहिस – कसगा भइया रामधन, तैं रइपुर नइ चलस गा ?

में काय करहूं जी उहां जाके। तोला मान मिलही तैं जा।
नइ गा गौंटिया, मोर मान त तुम्हरे मन ले हे। ये मान ह मोर नइ होवत हे। ए त हमर गांव अउ धरती माता के बढ़ई करेबर होवत हे।
मंगलू ह अउ कुछु कइतिस तेखर ले आघू रामधन ह रेंग दिस। मंगलू अपन जम्मों दुख के संगी संग मोटर मां बइठ के रइपुर बर चल दिस।

मंगलू अपन माई पिल्ला संग मोटर गाड़ी ले उतरिस त रइपुर के कलेट्टर साहेब ह मंगलू ल गोंदा के फूल के बड़का हार पहिराइस। ओतके बेह कइ झिन साहेब मन तारी बजाइन। मंगलू के कांधा उप्पर हाथ धर के कलेटेटर साहेब ह जम्मो झिन संग एक बड़का मंडप कोती रेंग दिन।

मंडप ल देखके मंगलू के जी ह धकपकावत रहय। गोड़ ह कांपत रहय। काबर के आज ले ओला कोनो अइसन उच्छाह के दिन ह देखे ल नइ मिले रहय। फेर करतिस का, मने मन बल बांधत राहय। मंडप मां अउ बहुत झिन साहेब बइठे रहंय। गजब मनखे सकलागे रहंय, ए मौका मं। मंगलू ह गुनै के केतेक मनखे त हमर रइपुरा पुन्नी मेला मां नइ सकलावैं।

कलेट्टर साहेब ह खुर्छी उपर बइठे अउ मनखे मन ले मंगलू के भेंट कराइस – ये हैं रइपुरा गांव के सम्मानित किसान श्री मंगलप्रसाद जी। इन्हें ही आज पुरस्कृत किया जावेगा। जम्मो साहेब मन उठ उठ के हाथ मिलावत रहंय।

एनाम के बेरा ह आगे। कलेट्टर साहेब ह एक बड़का थैली मां नोट ल धर के मंगलू ल दिस। मंगलू के हाथ ह कांपत रहय। ओह ओ थैली ल मोंगरा ल दे दिस। सही मां आज इन्खर दिन ह सोन के होगे राहय।

कलेट्टर साहेब ह किहिस – क्यों भाई मंगलप्रसाद, आपने इतनी अच्छी उपज कैसे पैदा की। कृपया आप बताइये ताकि हमारे ये दूर-दूर से आए किसानों को भी आपसे प्रेरणा मिले और हमारा देश भी अन्न धन से परिपूर्ण हो अपने बल पर जी सके।

मंगलू ह अब ले हिम्मत बांध ले रिहिस। ओह किहिस – भइया अउ साहेब मन ला राम राम। मेंह अतेक बने खेती कैसे उपजायेंव तेला में कहे त सकथंव फेर जम्मो झिन के समझ मां परही तेला नइ कहे सकंव। में रइपुरा गांव के जुन्ना गौंटिया के बेटा आंव। बेरा के मार ल गजब्बेच खाय उप्पर मोर बहिनी ह मोला खेती के चेत कराइस। फेर जुच्छा चेत करे ले का होतिस। कहूं सरकार ह छोटका केसान मन के मदत नइ करतिस।

आज हमर सरकार ह छोटका केसान के जम्मों किसिम ले मदत करथे। में त नइ जानत रेहेंव, फेर भइया बइसाखू ह मोला जनइस।

आज खेती ह सही मां कहूं चेत करके करे जावय त कोनों मुस्कुल काम नो हे। अधिक अनाज उपजावन मां। में ह मेटरिक किलास तक पढ़े हहावंव। मोला ये सब समझे मां बेर नइ लागय के कब हरियर खाद डालना हे, के कब अमोनिम खाद। आज के खेती ह पढ़इया भाई मन बर बने हे। फेर आज के गवंइ के भाई मन सहर मां पढ़े ल आतें अउ नउकरी करके अपन फेसन चलाथें अउ खाय बर अनाज अपन घर ले मंगाथें। ओमन ये नइ गुनयं के धरती ह बिन पोसइया के कबले उनला पोसही। बिन रोये दाई दूध नइ पियावय। फेर धरती ह कइसे पेट पोसही।

में कइथौं के जम्मो गंवइ के केसान मन अपन बेटा मन ला जोन सहर मां रहिके उन्खर दूनों तरफ ले नुकसान करत हावंय, उनला गांव मां वापिस बुला लैं। अउ उनला खेती केसानी मां लगा दैं। मोर मन कइथे के एक दिन उनला घला अइसने मान मिलही। अउ ये मान ल देख के हमर देस के जी जुड़ाही। अउ धरती माता के छाया ह हमर उप्पर दुख नइ आवन दिही।

मंगलू के भाखर पूरिस त कलेट्टर साहेब ह मंगलू ल अपन कउरा मां पोटार लिस। मनखे मन दियना के अंजोर अपन हृदय मां धर के नवा जिनगी बर गुनत चल दिन।

रइपुर मां मंगलू के सम्मान होवत रहय। अउ एती रामधन ह अपन संगी मन संग मंगलू के बखरी मां टेमा धर के खुसर गे। धान ह गंजाय रहय। जइसने ये मन आगी ल लगाय बर धरिन, वइसने फिरन्ता ह आगे। मंगलू के फरिका मां तारा परे रहय। फेर भितरी मां टेमा लेके कोन रेगंत होही! फिरन्ता ह जोर ले हांका पारिस। फिरन्ता के हांका परइ ल सुनते ये मन अपन परान लेके भागिन। रद्दा मां फिरन्ता ह पहार असन ठाढ़ होगे।

कोन हसगा ? रुकव नइ त एक एक के मूंड़ी नइच बांचय।

फिरन्ता के हांका परइ ले गांव वाला मन घला जुरिया गें। रामधन अउ ओखर संगवारी मन के मुख ह करियागे। फिरन्ता ह किहिस – देखलौ गा एह हमर गांव के गौंटिया आय। एखर करनी ल त दैखों, आधा जिनगी ला त मंगलू भइया ह दुख मां काट दिस। कोनों गांव वाला मन ओखर साथ नइ दिन। आज ओखर सुख के दिन मां इन्खर आंखी ह काबर फूटथे।
क्रमशः

भाग - बत्तीस



गांव वाला मनके जी ह आज सही मां दुख पावत रहय। मंगलू जोन हमर गौंटिया के बेटा आय, बेरा कुबेरा एकर ददा ह हमर मन के मदत करै। तेखरे हमन हिन्ता करेन। जात ले अलगिया देन। तभो ओह कुछु नइ किहिस। कखरो हिन्ता नइ गोठियाइस। हमरो मन के आंखी ह अंधियागे। मंगलू नइ होतिस त हमार गांव के बढ़वारी कइसे होतिस। इही गुनके गांव वाला मन मिलके रामधन अउ उन्खर संगवारी मन के मुंह करिया पोतके गांव भर मां घुमाइन अउ छोड़ दिन।

रतिहा मंगलू ह मोटर मां बइठ के गांव पहुंचिस। अपन दुआरी मां गरदी देखके ओखर जी ह उड़ागै। काय होगे हे भगवान। मोटर ले उतरिस तइसने फिरन्ता ह मंगलू के गोड़ मं मूंड़ी नवा दिस। फिरन्ता के देखते ओला उठाके अपन कउरा मां पोटार लिस। ओला देखके मोंगरा के जी ह घला जुड़ागे। इन्कर मिला भेंटी होते रहय तइसने रामधन हा आके मंगलू के गोड़ तरी गिरगे। मंगलू ह कुछु समझे नइ सकीस।

का होगे गा भइया रामधन ?

मोर मुख ह नइ फुटय गा, तोर मिहनत के कमइ ल सतियानास कर डारतेंव गा, कहूं फिन्ता हठका बेरा नइ आतिस। मोला छमा कर दे गा।

गांव के पटेल ह जम्मो गोठ ल मंगलू ल बताइस फेर मंगलू ह धीर धरिस अउ किहिस – भइया रामधन मोर हक ल तैं नइ मार सकस। तभे त भगवान ह दू बच्छर के भगाय फिरन्ता ल भेजिस। जेखर भगवान साथ देथे तेखर कोनों बिगारा नइ करे सकयं। जा में कुछु नइ कहंव।

सरी गांव मां मंगलू के बढ़वारी के गोठ चलय। गांव वाला मन ओला अपन गांव के पंच बना दिन। मंगलू ह गांव के तरक्की बर बढ़ कोसिस करै। मंगलू के मिहनत ले रइपुरा गांव मां कइ ठिन कुआं खनागे। बड़का इस्कूल घला खुलगे। रइपुरा गांव के बढ़ोतरी ल देख के तीर तखार के गांव वाला मन घला अपन गांव के तरक्की बर मंगलू ले सलाह ले ल आवयं।

थोरके दिन बितिस त फिरन्ता ह मंगलू ले किहिस – भइया अब में अपन बखरी मां जाके रइहौं तइसने गुनथौं। कतेक दिन इहां परे रइहूं।

मंगलू किहिस – बाबू मोर कोनों भाइ नइये। दमांद अउ भाइ एके समझ। मोर घर मां रहौ अउ खेती के बढ़ती मां हाथ बंटावव। दिन ह साथ दिही त तुमला कोनों दुख नइ होही।

ये त बने हे गा, फेर मोर गिरस्ती कइसे चलही। घर ह सुन्ना परे रइही उहू बने नइये। में खेती मां तोरे संग काम करहूं फेर रहइ अपने घर के बने होथे।
बने हे गा, जब कइबे मोंगरा ल बिदा कर देबोन।

मोंगरा ह आज नवा दुलहिन असन सीधा-समान किसिम किसिम के लुगरा ओन्हां, दाइज लेके अपन ससुरार बर तियार होवत राहय। मंगलू के जी आज जुड़ागे अपन बहिनी ल अपन मनके जिनिस देके बिदा करे ले। गांव वाला मन के आंखी ह उघरगे आनी बानी के जिनिस ल देखके।

केतकी के आंखी ले आंसू ह बोहावत रहय, जइसे ओखर बेटी ह बिदा होवत हे। ओला सुरता आगे अपन दाई के असीस के –

मंगनी करेंव बेटी जंचनी करेंव ओ,
बर करेंव बेटी बिहार करेंव ओ,
गबन करेंव बेटी पठौनी करेंव ओ,
जा जा बेटी कमाबे खाबे ओ,
मार दीही बेटी रिसाय जाबे ओ,
मना लिही बेटी त मान जाबे ओ,
जांवर जोड़ी संगे बुढ़ा जाबे ओ,
सुख-दुख के रद्दा नहक जाबे ओ।

डोली उप्पर मोंगरा अउ फिरन्ता बइठे रहंय। दूनो झिन ल आज अइसे लगय के आजेच भांवर परे हे। एक दूसर ल लजाय असन देखैं।

ठउका बेरा मां पहटिया अउ पहटनिन मन खेत मां बूता करत करत ददरिया मां माते रहंय।

दुरिहा आवत दिखथे डोला
रानी के सुरता खींचत हे मोला
पेड़ सुखागे पानी के अकाल
देस घर छुटगे परगे जंजाल
बरा दार पछित धोइले
डउका के सुरता चिटिक रोइले
मारे चिरइ भेर बनदूख
चेहरा देखके निसाना गये चूक
रइपुर कलकत्ता अब्बड़ दुरिहा
मोर संग आजा देखाहूं कुरिया

भूमिका – छत्तीसगढ़ के समाज-परिवार का अंकन

मोंगरा एक सफल उपन्यास कृति है जिसमें छत्तीसगढ़ का पारिवारिक एवं सामाजिक जीवुन-रूप अंकित है। आंचलिक उपन्यासकार के लिए आवश्यक होता है कि वह अपनी कृति को उस अंचल विशेष के जीवन से इस पऱकार संयोजित-समन्वित करे जिसे पढ़ कर एक अपरिचित व्यक्ति भी वहां के जन-जीवन के बारे में जान सके। आंचलिक जीवन, प्राकृतिक दृश्यावली, रीति-रिवाज, बोली आदि के स्वरूप उपन्यास में देखे जा सकते हैं। इस दृष्टि से मोंगरा एक सफल उपन्यास है।

मोंगरा में एक गरीब किसान का पारिवारिक जीवन चित्रित है। मंगलू, फिरंता, रामधन, बैसाखू, केतकी, मोंगरा के माध्यम से छत्तीसगढ़ के यथार्थ एवं स्वाभाविक जीवन का दर्शन किया जा सकता है। मंगलू के पिता ने बड़ी-बड़ी आशां बांध कर उसे पढ़ाया था परन्तु दुर्बाग्य ने वह सब न होने दिया, गहन गरीबी में जीवन बिताना पड़ा। परिस्थितियों के घातक प्रहारों से परेशान मंगलू को सामाजिक परम्पराओं को तोड़ना पड़ा, लोगों की निन्दा का पात्र बनना पड़ा। घर में छोटी जाति को किराएदार के रूप में रखना पड़ा जो एक रुढ़िग्रस्त सामाजिक ब्राह्मण के लिए कितना मुश्किल है। विपत्ति अकेले आती नहीं। एक के बाद अनेक। घर गिरने से वह बेकार हो गया, बचा-खुचा घर नीलाम हुआ, पैसों के अभाव में लड़की से हाथ धोना पड़ा, ढेरों कर्ज हो गया, बिरादरी की दुत्कार सकुननी पड़ी। इन सबके बाद भी वह ईमानदारी से विचलित न हुआ। इच्छा के विपरीत प्रणों से प्यारी बहन को उस युवक के हाथों सौंपता है जो सामाजिक उपेक्षा के कारण गलत मार्ग पर चल रहा था। इन सब थपेड़ों के बाद भी जैसे ही अनुकूल समय मिला, वह सम्हला। उसके दुर्दिनों का अंत हुआ। इस प्रकार की सुखद स्थिति एवं दुष्ट प्रकृति वालों को कर्म फल दिला कर जैसे उनके दिन फिरे वाली पारम्परिकता का लेखक ने निर्वाह किया है।

मंगलू के बाद पुरुष पात्रों में फिरंता प्रमुख है जो माता-पिता के प्यार-दुलार से वंचित सामाजिक उपेक्षा का शिकार हो कर दुर्दिन एवं परिस्थितियों के कारण कुमार्ग पर विवश होकर पेट पालने के लिए चल पड़ा है। व्यक्ति ममत्व-प्रेमी होता है। उसे जहां प्रेम और सहानुभूति मिलेगी वहीं रमेगा। निर्दयी समाज जिसे दूसरों की बुराई करने-देखने में ही सुख का अनुभव होता है, वह गरीबों की पीर-पराई क्या समझे। समाज की उपेक्षा ही फिरंता को इधर-उधर भटकने वाला कुमार्गी बनाने के लिए जिम्मेदार है। अन्यथा आंतरिक रूप से फिरंता में ऐसा कोई दोष नहीं है। वह उचित-अनुचित समझता है। स्वच्छन्द जीवन बिताने का अभ्यस्त फिरन्ता शादी के बाद मोंगरा के संपर्क में आता है। मोंगरा जो दुःख सह कर भी सम्मानपूर्ण जीवन बिताने के लिए त्सुक है, गलत कार्य करने से फिरन्ता को रोकती है। फिरन्ता बार-बार झूठ बोल कर उसे बहलाता रहता है। उसमें उदारता है, प्रेम और सहिष्णुता है, जिम्मेदारी के प्रति आस्था है। गलत ढंग से कमाए गए रुपए का भी दुरुपयोग नहीं करता। अन्ततः मोंगरा ही उसे सही मार्ग पर लाती है। मंगलू जहाँ निश्चल, ईमानदार, साहसी छत्तीसगढञी गरीब किसानों का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं फिरन्ता उन युवकों का उदाहरण है जो सामाजिक उपेक्षा और स्थितियों की विवशता के कारण वैसा करने को विवश होते हैं। फिरन्ता और मंगलू कामचोर हों, सो बात नहीं है। वे काम करना चाहते हैं, काम तलाशते हैं।


मंगलू की पत्नी केतकी एक बिना पढ़ी-लिखी परन्तु आदर्श भारतीय नारी है। उसने ऐतिहासिक निर्माण भले न किया हो, संघर्ष में तलवार भले न उठाई हो परन्तु भारती संस्कृति की प्रतीक पति-पूजक, धर्म निष्ठ गृहिणी के सारे गुण उसमें विद्यमान हैं। पति की हर मुसीबत में वह साथ है। कोई खीझ नहीं – उलाहना नहीं – अभाव के तकाजे नहीं। मोंगरा को अपनी संतान से अधिक समझती है – यहाँ तक कि एक बिगड़े युवक के साथ मोंगरा के विवाह किए जाने की बात सुन कर वह पति से स्पष्ट विरोध करती है।

उपन्यास की मुख्य पात्र मोंगरा को ही यह श्रेय है कि उसने दो परिवारों के जीवन में सुख का प्रसार किया। वह स्वाभिमानी, सरल, सहज न्यायप्रिय एवं ममतामयी है। मंगलू के दरिद्र जीवन को समाप्त करने और फिरन्ता को सही मार्ग पर लाने वाली वही है। इसीलिए संभवतः उपन्यासकार ने उसके ही नाम पर कृति का नामकरण किया है। मोंगरा को इस बात की चिन्ता रही कि उसके भाई का जीवन सुखी बने, पति सही मार्ग पर चले।

रामधन समाज के उस वर्ग का प्रतीक है जो दूसरों को चूस कर अपने को मोटा करना चाहते हैं, दूसरों की बुराई और निन्दा में सुख पाते हैं, दूसरों की समृद्धि से जलते हैं। मंगलू जैसे सीधे और ईमानदार व्यक्तियों को दुखी बनाने का कारण रामधन जैसे लोग ही हैं जो उनका घर नीलाम कर सकते हैं, बिरादरी से अलग कर सकते हैं, घरों में आग लगा सकते हैं।
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- डॉ. गंगा प्रसाद गुप्त ‘बरसैंया’