Wednesday, May 2, 2007

भाग - अट्ठारह



बादर के चन्देनी मन मइला गे रिहिन। जुम्मन घर के मुरगा ह बांग देत रहय। मोंगरा ह लकर धकर घर के संकरी ल देके मंगलू के घर कोती रेंगे ल धरिस त देखिस फिरन्ता ल हाथ मां बेड़ी डारे, दू झिन पुलुस वाला संकरी ल धरे हावंय। मोंगरा ह पीट लिस अपन मूंड़ी ल फेर कठवा के बनगे, ओखर मुख ले नइ भाखा फूटे अउ नही आंसू बरसे। आंखी ल उघरा नइ रखे सकिस, गदोरी ल मंडा लिस आंखी उप्पर।
बाई हमन तोर घर के खाना तलासी बर आय हवन। रतिहा फिरन्ता दारू बेचेके जुरुम मां धरागे हावय।
तुमन खाना तलासी लेहू ? कहां ले ले आनिस दारु ?

पुलुस वाला घर मां नींग के खाना तलासी लेन लगिन। घर के कोनों कोनहा हा नइच बांचिस उन्खर तलासी ले। फेर मिलिस कुछु नइ। मोंगरा माटी के पुतरी असन खड़े रिहिस। ओखर मूंड़ी ह किंजरत रहय। ओह जानय के पुलिस के गोड़ ह घर मं परगे, ये बने नोहे। दिन ह टेड़गा होवत हवय। हमर मन के इज्जत ल बचा दे गा भगवान। हमर इही गांव मां कतेक मान रहय। फेर दिन ह कुकुर गत कर दिस।

पुलुस वाला मन तलासी लेके रेंग दिन। फिरन्ता ह मूंड़ी ल निहुराय चल दिस, उन्कर पाछू पाछू।

सुरुज देवता ह बने चमचमात रिहिस। दुआरी के संकरी खुल्ला रिहिस। अउ मोंगरा ह अपन करम मां हाथ धरे बइठे रहय। ओह दुख मं भुलागे रहंय। ओतके बेर मंगलू ह हांफत हांफत मोंगरा के आगू मां आके ठाढ़ होगे। मोंगरा ह जइसने मंगलू ल देखिस चिचिया के रो डारिस। काय होगे भइया! मोर करम छड़ही के काय गत होवत जात हे।

रो झिन ओ मोंगरा दिन ह सब्बे आथे अउ रेंग देथे। हमन ला त भोगना हे, त डर्राव काबर।

तोला मालूम हवै, उनला पुलुस वाला धर के लाने रिहिन। घर के खाना तलासी लेइन हें। मोर आंखी ह फूट जातिस भइया, मेंह उनला अइसन दसा मां देखतेंव त निहीं।

काय करबे ओ नोनी । हमर करम ह फुटहा, भगवान ह गढ़िस हे। फिरन्ता ल जेहेल झिन होवय कइके हमला उकील लगाना भाग हे। थोरको रुपिया होवय त लान।

तें भोकवा होगे हस गा। में एक कउड़ी नइ देवंव। सरकार के दुसमन ल कइसे मदत देबे। तैं नइ जानस दारू के संग मां उनला पुलुस ह धरे हवय। अंगरा ल खाही त आगी जरुरेच उछरही। उकील लगाय के काम नइये। पाप केफल भोगना परही।

मंगलू ह मोंगरा के गोठ ल सुनके सन्न खागे। काटे त खून निहिं। ओह नइ जानत रहय के मोंगरा ह जम्मो गोठ ल जानत हवै। थोरुक रुक के मंगलू ह किहिस – बेरा ल झिन गवां ओ मोंगरा। झटकुन लान रुपिया। नइ त ओला जेहेल होइच जाही। में त कंगला होगेंव, मोर बस के त बात नइये।

मोंगरा ह तमतमा के किहिस – में नइ देवंव रुपिया। करनी के फल त मिलही। वो अपन होवय के आन।

मंगलू ह गजब बेर ले मोंगरा ल समझाइस। फेर मोंगरा ह नइच मानिस। मंगलू ह हार खाके रेंग दिस।
घाम ह भितिहा ले उतर के अंगना मं लोटत रहय। उहिंच्चे बाम्हन चिरइ ह फुदकत रहय। फेर मोंगरा के मन ह दहकत रहय। ओह आज अपन बस मां नइ रिहिस।

बेर ह बूड़त रहय। सूरज देउता दुनिया के सुख दुख के खबर लेके भगवान ल बताय ल उत्ता धुर्रा रेंग दिस। दिन ह बुड़गे।
क्रमशः

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