Wednesday, May 2, 2007

भाग - अट्ठाइस



गांव वाला मन ल घला आरो मिलगे रहय के मंगलू ल एक हजार रुपिया मिलगे हे। उन्खर मनके आंखी ह फुटाय असन होगे। ओमन घला रुपिया बेंक ले लागा मां ले रहंय। फेर मंगलू ल रुपिया मिलइ ह उनला अखरगे जइसे उन्कर ददा के रुपिया ल मंगलू ह झींक लाने हे।

गांव वाला मन के हांका परइ ह मोंगरा घला सुन डारिस। ओह फिरन्ता के दुख ल बिसरा के मंगलू के घर चल दिस। रद्दा मां देवी के मंदिर मां हाथ ल जोर के मूंड़ी नवाइस। बड़ सत के हावस हो देवी, मोर भइया के दुख ह तिरिया दे वो। तोला जम्मों झिन के फिकर लगे रइथे। तोरेच नोनी बाबू त आन। कतेक दुख ल देबे ओ। इही मने मन गुनत ओह मंगलू के दुआरी मां आगे। देखिस त दुआरी मां दू जोड़ी बने बइला बंधाय रहंय। ओखर जी ह जुड़ागे। वो उहिंचे ठाढ़ होगे। भितरी ले केतकी ह सानी के टोकना ल मूंड़ी मां धरे आवत रहाय। मोंगरा ल देखिस त सानी के टुकना ल भुइंया मां मढ़ा दिस अउ मोंगरा ल अपन कोउरा मां भर लिस।

अइ कइसे करत हावस ओ भउजी, भइया ले भेंट नइ होवत हे का।

हहो ओ नोनी, एखरे ले त तोला पोटार के अपन साध ल बुझावत हवंव। तैं त ओला केसानी काम मां लगा देय।

ले का होगे ओ भइया नइ देखे फेर में त नइ छोड़ंव तोला। मोर ले साध बुताथे त बुताले।

ले टार ओ तोर आनी बानी के गोठ ल, चल भितरी। मेंह बइला मन ल सानी देके आवत हवंव।
हहो।

मोंगरा ह भितरी मां जाके पीढ़ा उप्पर बइठगे। केतकी ह बइला मन ला सानी देके आइस त किहिस – नोनी तोर बात ल मान के हमर मन के दिन ह फिरही ओ तइसने लागथे। तैं हमर मन बर देउता होगे ओ, तोर मुख ले भगवान ह भाखा बोलिस।

ले चुप्पे रह ओ भउजी, तोर आनी बानी के गोठ ह मोर समझ मां नइ आवय। मनखे के करे कुछु नइ होवय ओ भउजी। जभ्भे भगवान ह चेत करथे तभे दुख ह सिराथे। भइया ह अतेक जल्दी केसानी करे बर मान जाही तेला में नइ जानत रहवं। फेर तोर मोहनी ले नइ बांचिस बेचारा ह तइसे लागथे।
ले फेर तोर आनी बानी के गोठ ह चले लागिस। तोर अब ले लइका मन असन गोठ चलथे।
काय करौं वो भउजी तोर मोहनी सूरत ल देखते मुख ले आनी बानी गोठ ह निकर जाथे।
ले टार ओ, तोर भइया ह खेत के मेंढ़ पार बनवाय बर खेत गे हे, बिहिनया ले। कुछु खाय पिए बर बना देंव। चल न रंधनी मां तहूं बइठबे।

ले चल काय होही।

रंधनी मां जाके केतकी ह बरा बनाय बर चूल्हा उप्पर कराही ल मढ़ाइस। बरा के छुनुन-मुनुन ह होवत रहय।

कस ओ नोनी, अब ले फिरन्ता के पता नइ चलिस। तोर भइया ह पता लगावत रइथे। कतको झिन ले कहि रखे हे। फेर अतेक दिन अकेल्ला रहि डारे अब तोर भइया कइथे के मोंगरा ल अब हमर मन संग आके रहिना चाही।

हहो भउजी आबे करहूं। तुम्हरे मन के त आसरा हावै मोला। तोर त घर ए ओ नोनी, तुम्हरे असीस ह त फलित होही ओ।

मोर काय ओ, भगवान ल जम्मों झिन के फिकर रइथे।

इन्खर गोठ ह नइ पुरे रहय अउ मंगलू ह आगे। मोंगरा ल देखत ओकर मुख मां हांसी खेलगे, तैं आय हावस ओ देवी दाई। तोर असीस ले मेंह पढ़ लिख के खेती करे ल धरलेंव।

तैं कभू कभू नानुक मन असन गोठ ल गोठिया डारथस भइया। पढ़े लिखे ह त आज काल खेती ल बने कर सकथे। आनी बानी के खाद निकलगे हावय अप्पढ़ ह त नइ समझे सकय। ओला त पुराना रद्दा रेंगे के टकर परगे हवय। नवा ल समझे में उनला डर लागथे। आज कहूं पढ़इया मन खेती करे ल धर लेवंय त हमर देश ले भुखमरी ह भगा जावय। आज पढ़ लिख के बाबू बने के कोसिस करथें, ए बने नो हे।
तैं त मोर दाई बनगे हावस ओ, तइसने लागथे।

नइगा भइया ये बात ह त मोर गजामूंग ह बने समझाथे। भांटो ह ओला जम्मो बात ल समझाथे अउ ओह मोला।

ह हो ओ डउकी मन के बुध ले चलही ये गांव ह।

ये त बात समझे के आय भइया, एमा डउकी-डउका के काय गोठ।

हहो ले चल बरा के महक आवत हे खाबोन।

ओतके बेर बाहिर ले धुर्रा में सनाय समारु अउ छोटका घला आगे। जम्मो झिन बइठ के बरा खाय लागिन। खाते खात मंगलू किहिस – मोंगरा तैं अब हमर मन संग आके रहिजा। खेती के काम ल धरे हन, तैं रहिबे त बूता ह कम होही अउ तोरो मन मं बोध लागही। मोंगरा हहो किहिस।

मोंगरा ह अब अपन भइया घर मां कोनों कोनहा मं अकेल्ला रोवय। कखरो अवई-जवई के आरो मिलते अंचरा ले आंखी ल झटकुन पोंछ डारय।

मंगलू ह खेती मां उत्ता धुर्रा भिड़गे राहय। ओह गुनय भगवान इही मां मोर बढ़ती ला कर देवय त मोर मन के साध ह पूर जाही। ओह बइसाखू ले पूछ-पूछ के खेती के काम ल मन लगा के करत रहय।
क्रमशः

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